जब एक मच्छर एक बूंद खून पीता है ,
उसको भी माफ नहीं किया जाता
तो रेप, abuse aur harassment की सजा
इतनी आसान क्यों?

जो सही होता है वो सुसाइड कर रहा है,
जो गुनहगार है वो अगले इलेक्शन का नामांकन भर रहा है।
जो पढ़ लिख लिए वो देश छोड़ रहे है।
बाकी लोग अपनी कमाई की होड़ में लगे है।

समाज की सामाजिकता जो किसी को छोड़ नहीं रही ।
एक ऐसा समाज जो जाने कब किसे खा जाए
यह पता भी ना चले
मां- बाप अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा और विकास के लिए
पाई पाई जोड़ रहे है।

बच्चे इस अंधे समाज की चपेट में आ रहे है।
पहले लड़की बचाओ के नारे लगे।
अब बदलाव दूर नहीं,
क्योंकि अब रेपिस्ट gender bias नहीं।

#rapistfreeindia #rapefreeindia

अभी तो चुनाव दूर ही थे
और मुद्दा मिल गया,
जिस वजह से वोट मिले,
वो मुद्दा वापस दोहरा दिया।
जब भीख मांगी गई थी
निर्भया के नाम की,
तो न्याय दिलाने में पूरा कार्यकाल ही ले लिया।
न्याय तो दिया बेशक।

पर फिर भीख मांगने के लिए
मनीषा का सहारा लिया जाएगा,
इस मुद्दे को फिर दोहराया गया।
फिर इलेक्शन आ गए
फिर कुछ देर भी नहीं हुई एक और लड़की इस
अंधे समाज की चपेट में आ गई।

अफसोस इतना है कि गुनहगार सब सामने है
पहले तो कानून अंधा था,
अब सब अंधे समाज में है।

ये सब तो वो थे जिन्हें मुद्दा बनाना
चुनाव के लिए जरूरी था।
एक पार्टी के कार्यकर्ता ने बहिन बना लिया
अब उस बेटी को
कहा न्याय तो बस अब हम ही दिलाएंगे आपको।

कैसे भूल गए ये लोग ,जिस राज्य की सत्ता हाथ में
न्याय दिलाने की जरूरत अभी भी है
वहां की बच्चियों , माओं , बहुओं और बेटियों को।
ये तो अभी ख़तम भी नहीं हुआ था।

फिर दूसरी पार्टी को सुध अाई
मै भी वही करती हूं। ( अफसोस पार्टी भी स्त्रीलिंग है)
उसने भी रोड जाम , दंगे फसाद किये,
परेशान तो आम नागरिक हुआ।
पर लांछन एक दूसरे में लगने में कामयाब रहे।

जनता बड़ी खामोश थी ,
जानती थी क्या होगा इस देश का।
इसीलिए खामोश थी
पैसे कमाने की होड़ में मसगुल थी।
क्योंकि जानती थी कोई मोल नहीं यहां
मेरे जीवन का, आज कुछ बोल पड़ा अगर
तो ना जाने कल का दिन आखिरी दिन हो मेरे जीवन का।

Image source Times of India


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