समझ नहीं आता

औरत एक मनोरंजन या मजबूर

समझ नहीं आता खुश हो जाऊ , की शोर तो हुआ कम से कम
या फिर से दुखी। कि आखिर ये क्यों हुआ
कैसी ये न्याय शैली है,
जो औरतों के सामने इतनी मजबूर है,
बेबस और बेचारी है,
अफसोस तो इस बात का होगा, आवाजें कई उठी हैं।
पर कानून को,
अभी इसकी जरूरत महसूस नहीं होती है।


वो कहते हैं
जुर्म नहीं है, बस गरम खून है
वो कहते हैं
जुर्म नहीं है, बस गरम खून है
पर क्या बताएं इन लोगों को, इस गरम खून की गरमी तो ताउम्र है।
इस प्यासे को किसने ये बताया कि प्यास पानी से नहीं औरत से बूझे गी
वो लोग कहते है सब पैदा तो अबोध ही होते हैं
पर फिर कौन है वो? जिसने इस प्रथा को फैलाते हैं।

वो बोलते हैं ,” कुछ एक चीखी थी।”
“तो आवाज दबा देता ,वैसे भी कौन सुनेगा उसकी” । बोल देता तेरी कोई नहीं सुनेगा।मै बता दूंगा सबको ,
अरे शर्म से ही मर जाएगी तू चिंता मत कर
बड़े अबद्र है लोग दुनिया के खुद ख़तम कर देंगे
उस बात को , उस रात को , उस दिन को ,उस शाम को, उस पल को , उस अंधकार को , उस पाप को।

जब सेक्स के नाम लेने में , जो आपत्ति घरों में दिखती है।
वो रेप करने में भी कह देती है, वो लड़की ही खराब थी।

अरे क्या ही होगा इस व्यवस्था का
जो लड़की को हर जगह बस एक मनोरंजन का सदन और अनुभव बनते आये हैं

अरे तुमहे क्या ही पता चलेगा, की क्या हुआ होगा उसके साथ।
ज़िंदा रह भी जाए तो रह नहीं पाती है , वो बन जाती बेबस और लाचार।
वो दिन कभी नी गुजरता,
बिना बताए याद की तरफ।
वो चिखे , वो लोग , जो खुलेआम है
जब देखती हैं वो निगाहें उन गुजरते हुए
उस सड़क से, दर्द से भर जाता है हर रोज

इसीलिए वो कहते है कि
हम तुम्हारे हौसलों को दबा के निगल जायेगे।
और जो ना निगल पाए तो जला देंगे।

अस्तित्व में जो दांग ये रखा था उन दरिंदों ने।
दुनिया ने खुले आम उन्हें स्वीकारा है।
बस बचा क्या रहा उसके साथ

बस रह जाएगी कुछ चीखने की आवाजें, जो बंद हो जाएगी जब थम जाए सांसे,
क्या लगता है इन्हें,
की दर्द सिर्फ उस वक़्त होता हैं।
अरे शाहब ! ये दर्द तो जीने के बाद भी आस ले जाता है।

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